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Interesting Truth of Histoty of India* संघियों के लिए, अंडभक्तों के लिए और झोड़बन्द मुस्लिमों के लिए बस इतनाही….

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लेख:-मुग़ल बादशाह अक़बर ने अपने हुक़ूमत की 50 साल पूरे होने के मौके पर ये सिक्का लॉन्च किया था। सिक्के के एक तरफ देवनागरी लिपि में राम-सिया लिखा हुआ है और उनकी तस्वीर भी है। सिक्के के दूसरी तरफ फ़ारसी में امرداد یلاهی 50 (50 वां वर्षगांठ) लिखा है। महराणा प्रताप से जंग की वजह से जो अक़बर को हिंदू विरोधी बताते है ये सिक्का बताने के लिए काफी है अक़बर सत्ता विरोधी थे धर्म विरोधी नही। उन्होंने अपने दरबार मे मुस्लिमो से ज़्यादा हिंदुओं को ऊंचे पदों पर रख था। तब इस देश का ब्राम्हणवाद उन्हें “जगदीश्वरो” “देवेश्वरो” कह रहा था… और आज भारत का मेहनतकश मूल निवासी मुसलमान उनके “रामराज्य” के धार्मिक द्वेष के निशाने पर है! आज वे मुस्लिम समाज को अपनी राजनैतिक सत्ता के लिए बलि का बकरा बना रहे है और मुस्लिमों के नुमाइंदे है कि वे 800 साल को “इस्लामिक, मुस्लिम राज” के गुलगुले खिला रहें है! बाबर से लेकर अकबर… हुमायूं से लेकर औरंगजेब, औरंगजेब से लेकर टीपू सुल्तान तक सबके दरबार मे ब्राम्हणवाद बैठक मारकर सत्ता में शामिल था! सुल्तान टीपू तो रामनाम की अगूंठी हाथ में पहनते थे, और ब्राम्हण पूर्णय्या पंडित प्रधानमंत्री था! रामनवमी की शाही यात्रा टीपू निकाला करते थे, उसकी अगुवाई करते थे! ब्राम्हण पंडित उनकी आरती उतारते थे! आज ये सब “हिन्दू धर्म विरोधी” करार दिए गए! और मियांजी है के इन्हें “हजरत” कह कर संघ के हमलों को और हवा देते है! मध्ययुग के सभी राजे, बादशाह, सुल्तान कोई धर्मयुद्ध नहीं लढ रहे थे, वे राजनैतिक संघर्ष था, जिसमे धर्म वीशेष का कोई रोल नहीं था! शिवाजी महाराज कब35 टका सियाही मुस्लिम थे, तो बादशाह औरंगजेब की फौज में 60 टका हिन्दू-राजपूत-मराठा फौज थी! राणा प्रताप के सेनापति मुस्लिम थे! इसका मतलब कोई शुध्द हिन्दू धर्म के राजा नहीं थे, और कोई शुद्ध सिर्फ इस्लाम धर्म के राजा नहीं थे! थे तो बस सत्ताधारी… और संघर्ष राजनैतिक सत्ता का…

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