Home आंतरराष्ट्रीय यौम ए पैदाइश : *बहादुर शाह ज़फ़र*

यौम ए पैदाइश : *बहादुर शाह ज़फ़र*

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आज मुग़ल सल्तनत के आख़िरी हुक्मरान सिराजुद्दीन बहादुर शाह ज़फ़र का यौम ए पैदाइश (24 अक्टूबर) है. हालांकि वो एक कमज़ोर हो चुकी सल्तनत के फ़रमांरवा थे लेकिन अवाम के दिलों में उनकी बड़ी अक़ीदत और मोहब्बत थी.

#1857_की_जंग और बहादुर_शाह_ज़फ़र

1857 की पहली जंग ए आज़ादी में क्रांतिकारियों ने दिल्ली पर क़ब्ज़ा कर लिया और अंग्रेज़ों को खदेड़ दिया. सारे क्रांतिकारी लाल क़िले पहुंचे और बहादुर शाह ज़फ़र से लीड करने की गुज़ारिश की. 82 साल के शहंशाह ने कहा

“न तो मैं बादशाह हूँ और ना बादशाहों की तरह तुम्हें कुछ दे सकता हूं . बादशाहत तो अर्सा हुआ मेरे घर से जा चुकी. मैं तो एक फक़ीर हूं जो अपने बच्चों को लिए तकिये* में बैठा है”
(*तकिया फक़ीर के घर को कहते हैं इसीलिए बाज़ मोहल्लों के नाम तकिये पर होते हैं )

लेकिन क्रांतिकारी ज़िद पर अड़ गए और बहादुर शाह को उनकी बात माननी पड़ी.

आसमान ने अपना रंग बदला, अंग्रेज़ों ने 14 सितंबर को कश्मीरी गेट तोड़ कर दिल्ली पर कब्ज़ा किया और बहादुर शाह ज़फ़र को गिरफ्तार कर के उन्हें इस पूरे हंगामे का ज़िम्मेदार ठहराया गया और हुमायूं के मक़बरे में उन्हें क़ैद कर लिया गया.

एक अंग्रेज़ ऑफिसर बहादुर शाह ज़फ़र से मिलने आया कि देखें अकबर-औरंगज़ेब जैसे महान बादशाहों का बेटा कैसा है? उसने देखा कि एक बूढ़ी औरत चूल्हे पर कोई चीज़ बना रही है जिस से बदबू उठ रही है और एक बूढ़ा थोड़ी दूरी पर बैठा हुआ हुक्का पी रहा है.अंग्रेज़ ऑफिसर उनके पास गया और एक ज़ोरदार थप्पड़ मारा और फख्र करता हुआ निकल गया. बूढ़ा शहंशाह इसी तरह बैठा रहा.

बहादुर शाह के 2 बेटों और एक पोते को खूनी दरवाज़े पर काट दिया गया और फिर सुबह के नाश्ते में, एक बड़ी प्लेट में सजाकर उनके दो बेटे मिर्ज़ा मुग़ल, मिर्ज़ा खिज़्र और एक पोते अबू बक्र के कटे हुए सर पेश किए गए. बूढ़ा शहंशाह रोया नहीं बल्कि कहा कि

“मुग़ल शहज़ादे अपने बाप के सामने सुर्खरू हो आए हैं”

अब यहां सुर्खरू लफ्ज़ देखिए इसका शाब्दिक मतलब है लाल मुंह लेकिन ये कामयाब के लिए बोला जाता है. यानी मुग़ल शहज़ादे शहीद हुए यानी कामयाब हुए और उनका चेहरा खून से सुर्ख है

बहादुर शाह को काले पानी की सज़ा हुई. जब उन्हें रंगून ले जाया जा रहा था तो पूरी दिल्ली सड़कों पर खड़ी थी और अपने शहंशाह को आखिर विदाई दे रही थी. कोई ऐसी आँख नहीं थी जिसमें आंसू नहीं था. अकबर ए आज़म और औरंगज़ेब आलमगीर का पोता आज अपने ही बाप दादा की विरासत से बे दखल हो रहा था.

ए आसमान तुझ पर अफ़सोस!

सात नवंबर 1862 को बहादुर शाह ने वफ़ात पाई और मुग़ल सल्तनत का आफताब ए इक़बाल हमेशा हमेशा के ग़ुरूब हो गया. बदनसीब बहादुर शाह को अपने ही यार के कूचे में दो गज़ ज़मीन भी नहीं मिली.

*कितना है बदनसीब “ज़फ़र” दफ्न के लिए*
*दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू ए यार में.*

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