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फ़ातिमा शेख के जन्मदिवस (9 जनवरी) पर लड़ो पढ़ाई करने को! पढ़ो समाज बदलने को!

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*इऱफान शेख द्वारा*
फ़ातिमा शेख भारत की प्रथम महिला शिक्षिकाओं में थीं। फ़ातिमा शेख ने अपने भाई उस्मान शेख की प्रेरणा पर पढ़ना-लिखना सीखा और सावित्रीबाई फुले के कार्य में उनकी अनन्य सहयोगी बनीं। जब ज़्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले को जातीवादी ताकतों के विरोध और दबाव के चलते अपना घर छोड़ना पड़ा तो उस्मान शेख ने अपने घर में उन्हें जगह दी और वहीं पर महिलाओं के लिए स्कूल की शुरुआत की। सावित्रीबाई फुले की तरह, फ़ातिमा शेख का तो कोई लेखन-कर्म, कविताएं, पत्र आदि नहीं मिलता है, लेकिन सावित्रीबाई फुले ने अपने पत्रों में फ़ातिमा शेख का जिक्र किया है। फ़ातिमा शेख की विरासत के उपेक्षा का शिकार होने के कारण उनके बारे में बहुत ज़्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है।
सावित्रीबाई फुले और फ़ातिमा शेख अलग-अलग धर्मों की थीं लेकिन उन्होंने मिलकर अपने दौर में लड़कियों की शिक्षा के लिए संघर्ष किया। फ़ातिमा शेख और सावित्रीबाई फुले के संघर्ष का दौर वही था जब अंग्रेज़ों ने देश में साम्प्रदायिकता के बीज बोने शुरू किए थे। अंग्रेज़ों द्वारा बोए गए साम्प्रदायिकता के इन बीज़ों को आगे चलकर धार्मिक कट्टरपंथी संगठनों, फ़ासिस्ट संगठनों ने खाद-पानी देकर बड़ा किया जिसकी त्रासद कहानी देश के बँटवारे तक पहुँची। आज साम्प्रदायिक फ़ासीवादी पूरे देश में हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच नफ़रत की दीवार खड़ी कर कर रहा है। जिससे जनता को असली सवालों से हटाकर आपस में लड़ाया जा सके और अपने आका बड़े-बड़े कॉरपोरेट घरानों की सेवा की जा सके। इन फ़ासीवादी ताकतों के खिलाफ़ संघर्ष में फ़ातिमा शेख और सावित्रीबाई फुले जैसे नायकों और उनके संघर्ष को लोगों के बीच में स्थापित करने की ज़रूरत बहुत ज़्यादा है।
आज फ़ातिमा शेख की विरासत को याद करते समय हमें यह भी देखने की ज़रूरत है कि शिक्षा पर भी फ़ासीवादी हमला तेज़ हो रहा है। फ़ासीवादी नीतियों द्वारा लाई गई नई शिक्षा नीति इस फ़ासीवादी हमले का एक दस्तावेज़ है। शिक्षा को कॉरपोरेट घरानों के हवाले करना, अवैज्ञानिक-अतार्किक विषयों को पढ़ाने, फ़ीसें बढ़ाने और सीटें घटाने की मार से आज आम लोग त्रस्त हैं। सावित्रीबाई फुले और फ़ातिमा शेख ने अपने समय में जिस संघर्ष की शुरुआत की थी और शिक्षा के प्रचार-प्रसार, सामाजिक कुरीतियों-अन्धविश्वासों के खिलाफ़ लड़ने का जो बीड़ा उठाया था; वह हम सभी के लिए प्रेरणास्रोत है। उनके संघर्षों की रोशनी में हमें आज के समय में सबको समान एवं निःशुल्क शिक्षा के लिए, शिक्षा के साम्प्रदायिकीकरन और व्यवसायिककरन के खिलाफ़ लड़ाई को भी तेज़ कर देना होगा।

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